Monday, March 8, 2010

सच्ची तपस्या

मृत्यु के बाद साधु और डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे। यमराज ने कहा, 'मैं आप दोनों के मुंह से ही सुनना चाहता हूं कि आपने अपने जीव

न में क्या-क्या किया। पर झूठ न बोलना। यहां असत्य बोलने पर तुम्हारे बचाव की कोई गुंजाइश नहीं है।' यमराज की बात सुनकर डाकू डर गया और बोला, 'महाराज, मैंने जीवन-भर पाप किए हैं। हां, मुझे याद आता है कि एक बार मैंने एक निर्धन को खाना खिलाया था और एक बार एक वृद्धा जख्मी हालत में बुरी तरह तड़प रही थी, तब मैंने उसकी मरहम-पट्टी करवाई थी।'
डाकू की बात सुनकर साधु प्रसन्न होकर बोला, 'महाराज, मैंने तो जीवन भर तपस्या और भक्ति की। अपार कष्ट सहे तब कहीं जाकर मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसलिए मेरे लिए यहां सभी सुख-साधनों का प्रबंध किया जाए।' यमराज डाकू से बोले, 'देखो, तुम्हारा जीवन पापमय रहा है। हालांकि तुमने कुछ पुण्य भी किए ही हैं, इसलिए दंड के रूप में तुम साधु की पूर्ण समर्पण भाव से सेवा करो।' डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली। यमराज का आदेश सुनकर साधु नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोला, 'महाराज, इस दुष्ट के स्पर्श से तो मैं अपवित्र हो जाऊंगा। क्या मेरी भक्ति का पुण्य निरर्थक नहीं हो जाएगा?'
यह सुनकर यमराज क्रोधित होकर बोले, 'यह डाकू अपनी गलती का अहसास कर इतना विनम्र हो गया है कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि जीवन भर की तपस्या व भक्ति के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सभी व्यक्ति में एक ही आत्म-तत्व समाया हुआ है। यदि व्यक्ति गलती का अहसास कर नेक रास्ते पर चलने लगे तो उसका मार्गदर्शन करना एक साधु का कर्त्तव्य है । किंतु तुम तो मृत्यु के बाद भी गर्व से भरे हुए हो, इसलिए तुम्हारी तपस्या और भक्ति निरर्थक है। तपस्या और भक्ति तभी सार्थक होती है जब वह नि:स्वार्थ और बिना किसी उद्देश्य के की जाती है।'

1 comment:

  1. सही है. गर्व को त्यागना ही श्रेयस्कर है.
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